एक बात, जो ठीक से कहनी थी
Nisha,तुम्हें मेरा पूरा ध्यान चाहिए था। आधा नहीं।
तुम एक ज़रूरी बात कहना चाह रही थीं। मेरा ध्यान बार-बार फ़ोन पर जा रहा था। फिर जब तुमने कहा कि बुरा लगा, मैंने उस बात को भी टाल दिया। आज उसे कोई अच्छा नाम नहीं देना चाहता। बस अपनी गलती माननी है।
कुछ बातें, जो माननी हैंकुछ बातें,
बिना सफ़ाई दिए।
अपने समय से पढ़ना।
01मेरी गलती कहाँ थी।
तुमने बस दस मिनट का पूरा ध्यान माँगा था। मैंने उसे भी फ़ोन के बीच की जगह समझ लिया। एक कमरे में होना और किसी के साथ सच में मौजूद होना, एक बात नहीं है।
02तुमने जो बताया।
तुमने कहा कि लगा जैसे तुम्हारी बात की कोई अहमियत नहीं है। उस वक़्त भी सुनने के बजाय मैंने बात टाल दी। तुम्हें अपनी तकलीफ़ की वजह भी समझानी पड़ी।
03जो बदलना चाहता हूँ।
जब हम बात करने बैठें, फ़ोन अलग रखना चाहता हूँ और बिना बीच में टोके सुनना चाहता हूँ। यह करने की ज़िम्मेदारी मेरी है। इस पन्ने पर लिख देना उसका सबूत नहीं है।
बिना सफ़ाई दिए, एक ख़त।
इसे पढ़ने से पहले जवाब ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं है।
तुम्हारे एहसासों की कोई समय-सीमा नहीं है।
अपने समय से पढ़ना। जवाब देना, बात करना या माफ़ करना—यह तुम्हारा फ़ैसला है। मुझे जो सुधारना है, वह आज ही जवाब मिलने पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
माफ़ी चाहता हूँ। कोशिश है कि आगे मेरे काम भी यही बात कहें।
Deepak
जब मन करे, यह ख़त यहीं मिलेगा।